चालीस का मैच आज अर्जुन चालीस साल का है। आज उसका पहला मुक्केबाजी मैच है। वह छोटे नगर के खेल भवन में खड़ा है। बाहर उसकी पत्नी और बेटी बैठी हैं। अर्जुन दफ्तर में पैसे का हिसाब करता है। वह सुबह से काम नहीं करता। आज उसने छुट्टी ली है। सीमा उसके हाथ पर पट्टी बांधती है। सीमा उसकी मुक्केबाजी की शिक्षक है। वह अर्जुन की आंखों को देखती है। “हाथ ठीक है?” सीमा पूछती है। “हाथ ठीक है।” “सांस ठीक है?” “सांस ठीक है।” “पैर?” “पैर थोड़ा दर्द करता है।” “पैर से काम करना है। हाथ से नहीं।” अर्जुन सामने खड़े दीपक को देखता है। दीपक उससे बहुत छोटा है। दीपक दो साल से मैच करता है। उसके हाथ पर भी पट्टी है। दीपक कहता है, “आप तैयार हैं?” “मैं तैयार हूं।” “पहला मैच है?” “हां। पहला मैच है।” “तो धीरे चलिए।” “तुम भी धीरे चलो।” घंटी बजती है। दीपक आगे आता है। उसका पहला हाथ अर्जुन के कंधे पर लगता है। अर्जुन पीछे जाता है। सीमा बाहर से बोलती है, “पैर! पैर से काम करो!” अर्जुन पैर चलाता है। वह दीपक के हाथ को रोकता है। फिर वह दीपक के पेट पर हाथ लगाता है। दीपक पीछे जाता है। बाहर से लोग बोलते हैं। अर्जुन की सांस तेज हो जाती है। उसका बायां पैर कांपता है। घंटी फिर बजती है। पहला भाग खत्म होता है। अर्जुन कुर्सी पर बैठता है। सीमा पानी देती है। “अब कैसा है?” सीमा पूछती है। “पैर खराब है।” “पैर रहेगा। तुम रहोगे?” “मैं रहूंगा।” “फिर उठो।” अर्जुन उठता है। सामने दीपक पानी पी रहा है। दीपक उसकी तरफ देखता है। “चालीस में भी करते हैं?” दीपक पूछता है। “चालीस में भी करते हैं।” “पैर नहीं मानता होगा।” “आज मानता है।” घंटी बजती है। दीपक जल्दी आता है। अर्जुन का चेहरा उसके हाथ से बच जाता है। अर्जुन एक हाथ मारता है। हाथ दीपक की नाक पर लगता है। दीपक की नाक से खून आता है। खेल रुकता है। सीमा अर्जुन के पास आती है। “अब रोक देंगे?” सीमा पूछती है। “नहीं।” “तुम्हारा हाथ भी दुख रहा है।” “दुख रहा है। फिर भी नहीं।” खेल फिर शुरू होता है। दीपक अब दूर नहीं रहता। वह अर्जुन के पेट पर हाथ मारता है। अर्जुन का शरीर पीछे जाता है। अर्जुन गिरता नहीं। वह हाथ ऊपर रखता है। समय कम है। “अर्जुन, अब!” सीमा बोलती है। अर्जुन आगे जाता है। दोनों के हाथ एक साथ चलते हैं। घंटी बजती है। दोनों रुकते हैं। कुछ देर कोई नहीं बोलता। लोगों का फैसला आता है। दीपक जीतता है। अर्जुन हारता है। दीपक उसके पास आता है। “आप अच्छे थे,” दीपक कहता है। “तुम अच्छे थे।” “पैर कैसा है?” “अभी भी दर्द है।” दीपक अपना हाथ आगे करता है। अर्जुन उसका हाथ पकड़ता है। बाहर पत्नी खड़ी है। उसके हाथ में घर का कागज है। आज किराया देना है। मैच का पैसा नहीं मिला। अर्जुन कागज देखता है। फिर वह अपनी पट्टी खोलता है। सीमा कहती है, “कल फिर आओगे?” अर्जुन पट्टी फिर बांधता है और कहता है, “कल दफ्तर के बाद आऊंगा।”