दाल, तड़का और रोटी पंजाब की रसोई में दाल रोज के भोजन का एक मुख्य हिस्सा है। यहाँ एक ही तरह की दाल नहीं बनती। मूंग, मसूर, चना और उड़द अलग समय पर काम आते हैं। साबुत काली उड़द से बनी दाल को माँह दी दाल भी कहते हैं। यह दाल धीरे पकती है और इसका रूप गहरा होता जाता है। पीली दाल जल्दी तैयार होती है, इसलिए वह रोज के खाने में खूब मिलती है। दाल पहले साफ पानी से धोई जाती है। कुछ दालों को पकाने से पहले पानी में रखा जाता है। फिर दाल पानी, नमक और हल्दी के साथ नरम होने तक पकती है। चना दाल अपना थोड़ा रूप रखती है, पर मसूर जल्दी टूट जाती है। पानी की मात्रा से दाल पतली या भारी बनती है। पंजाबी घर की दाल अक्सर इतनी भारी होती है कि रोटी उसे उठा सके। अब तक दाल सीधी और शांत लगती है, लेकिन काम पूरा नहीं होता। अंत में तड़का तैयार होता है, जिसे कई घरों में छौंक भी कहते हैं। छोटे बर्तन में घी या तेल गरम किया जाता है। उसमें जीरा पड़ते ही तेज आवाज आती है। फिर प्याज, लहसुन, अदरक और हरी या लाल मिर्च डाली जा सकती है। कई दालों के तड़के में टमाटर भी पकता है। हर घर का तड़का थोड़ा अलग होता है, पर उसका काम वही रहता है। गरम तड़का पकी हुई दाल के ऊपर डाला जाता है। उसी पल तेल, जीरा और लहसुन का स्वाद पूरी दाल में जाता है। ऊपर थोड़ा हरा धनिया भी रखा जा सकता है। पंजाब में गेहूँ और दालें लंबे समय से भोजन का आधार रहे हैं। इसी कारण दाल और गेहूँ की रोटी साथ खाने की आम जोड़ी बनी। घी और दूध का उपयोग भी पंजाब के खाने में पुराना और सामान्य है। दाल दिन के भोजन में भी आती है और रात के भोजन में भी। इसके साथ प्याज, दही या अचार रखा जा सकता है, लेकिन ये जरूरी नहीं हैं। गरम रोटी हाथ से तोड़ी जाती है और उसका छोटा टुकड़ा दाल में लगाया जाता है। तड़का ऊपर रहता है, दाल नीचे रहती है, और रोटी का अगला टुकड़ा कटोरी में जाता है।