पहली रोटी आज मीरा की दुकान खुलने का पहला दिन है। मीरा को काम चाहिए। दुकान छोटी है। सामने सड़क है। अंदर रोटी बनाने की मशीन है। मशीन बंद है। एक भाग टूट गया है। मीरा के पास कम पैसे हैं। कबीर दुकान में आया। उसने मशीन को देखा। उसने कहा, “मशीन बंद है।” मीरा ने कहा, “जी, यह बंद है।” कबीर ने पूछा, “रोटी बनती है?” मीरा ने कहा, “नहीं बनती।” कबीर ने पूछा, “पैसे हैं?” मीरा ने कहा, “बहुत कम हैं।” कबीर ने अपनी जेब देखी। उसमें एक रुपया था। उसने रुपया मेज पर रखा। “मेरे पास इतना है।” मीरा ने रुपया लिया। “इससे भाग नहीं मिलेगा।” “भाग कहाँ है?” “दुकान में था। कल टूट गया।” “तो आज दुकान कैसे चलेगी?” “पता नहीं।” कबीर ने दुकान के बाहर देखा। कोई आदमी नहीं था। मीरा ने एक बर्तन में पानी लिया। उसने रोटी का काम शुरू किया। मशीन नहीं चली। रोटी छोटी रही। कबीर ने पूछा, “तुम्हारा मन अच्छा है?” मीरा ने कहा, “नहीं।” “क्यों?” “आज पहला दिन है। काम नहीं है। रोटी नहीं बनती।” कबीर कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “मुझे भी काम चाहिए।” मीरा ने उसे देखा। “तुम क्या कर सकते हो?” “मैं भाग लगा सकता हूँ। मैं चीजें ठीक कर सकता हूँ।” “तुमने यह भाग देखा?” “नहीं। अब देखता हूँ।” कबीर मशीन के पास बैठा। उसने लोहे का भाग उठाया। एक छोटा कील नीचे था। उसने कील निकाला। फिर उसने भाग लगाया। मशीन चल पड़ी। मीरा ने रोटी का काम फिर किया। रोटी बड़ी होने लगी। दोनों ने रोटी को देखा। कबीर ने कहा, “रोटी बड़ी होती है।” मीरा ने कहा, “जब दुकान में किसी का मन अच्छा होता है, तब रोटी बड़ी होती है।” कबीर ने कहा, “यह बात पहले क्यों नहीं कही?” “तुमने पहले पूछा नहीं।” कबीर हँसा। मीरा भी हँसी। रोटी और बड़ी हुई। बाहर से एक और आदमी आया। उसने पूछा, “रोटी है?” मीरा ने कहा, “जी, है।” आदमी ने पूछा, “कितने की?” “एक रुपये की।” उसने एक रुपया दिया। मीरा ने उसे रोटी दी। आदमी ने रोटी खाई। उसने कहा, “अच्छी है।” मीरा ने कबीर से कहा, “अब तुम काम करोगे?” कबीर ने कहा, “अगर तुम पैसा दोगी।” “आज एक रुपया दूँगी।” “और कल?” “कल दो रुपये होंगे।” कबीर ने मशीन की ओर देखा। “कल फिर रोटी बड़ी करेंगे।” मीरा ने नया भाग उठाकर पास रखा।