सही समय की रसीद दिल्ली की रात मेरे दफ़्तर की खिड़की पर काली धूल छोड़ रही थी। मैं राघव हूँ, और उस वक्त मेरी आँखें घड़ी से भी अधिक थकी थीं। रात के ग्यारह बजकर सत्रह मिनट पर मीरा अंदर आई और सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने मेज़ पर एक मोटा लिफाफा रखा। “यह अगले हफ़्ते का पैसा है,” उसने कहा। “काम आज शाम खत्म हो गया था,” मैंने कहा। “मैंने निखिल को ढूँढ़ लिया।” मीरा ने अपना गीला दुपट्टा ठीक किया, पर लिफाफा वापस नहीं लिया। उसी दोपहर दो बजकर दस मिनट पर उसने मुझे अपने गुम पति को खोजने के लिए रखा था। चार बजकर पाँच मिनट पर मुझे निखिल उसके अपने घर में मिल गया था। वह बेडरूम में पर्दे के पीछे खड़ा था और एक छोटे बैग में कपड़े भर रहा था। उसने मुझसे कहा था, “मीरा को मत बताइए कि मैं घर आया था।” मैंने पूछा था, “आप उससे भाग रहे हैं या किसी और से?” उसने बैग बंद करके कहा था, “दोनों में अब कोई फ़र्क नहीं है।” अब मीरा मेरे सामने बैठी थी, और उसकी उँगलियाँ लिफाफे पर टिकी थीं। “निखिल घर पर नहीं था,” उसने कहा। “मैंने उसे देखा था।” “आपने चार बजकर पाँच मिनट पर देखा था,” उसने कहा। “आप हर समय इतना सही क्यों लिखते हैं?” बाहर सड़क पर एक खाली बस गुज़री, और नीली रोशनी कमरे की दीवार पर फिसल गई। मैंने लिफाफे को उसकी ओर धकेल दिया। “निखिल अब कहाँ है?” मैंने पूछा। “अब वह सच में गुम है।” “यह जवाब नहीं है।” “आज के लिए इतना ही जवाब है।” उसने बताया कि छह बजे वह अपने दफ़्तर के कैमरे में दिखाई दे रही थी। उसने यह भी कहा कि मेरी रसीद साबित करेगी कि निखिल चार बजे तक ज़िंदा था। “आपको पति नहीं खोजवाना था,” मैंने कहा। “आपको सही समय चाहिए था।” मीरा ने पहली बार मेरी तरफ़ सीधा देखा। “मुझे एक ठीक गवाह चाहिए था, और आप ठीक काम करते हैं।” मेरे पेट में दोपहर की ठंडी चाय जैसे भारी हो गई। एक गुम आदमी का मामला अब हत्या का मामला था, और मेरे नोट उसके बीच रखे थे। “अगर मैं पुलिस को बुलाऊँ?” मैंने पूछा। “तो उन्हें बताइए कि आप घर में अकेले गए थे,” मीरा ने कहा। “इमारत के कैमरे में आपका चेहरा भी साफ़ होगा।” वह उठी और दरवाज़े तक गई। “अगले शुक्रवार मैं फिर पैसे दूँगी,” उसने कहा। “आप निखिल को खोजते रहेंगे।” दरवाज़ा बंद होने के बाद मैंने घड़ी में ग्यारह बजकर इकतीस मिनट लिखे। फिर मैंने लिफाफे को बिना छुए सबूत वाले खाली डिब्बे में गिरा दिया।