छत की कुर्सी लखनऊ के एक छोटे शादी भवन में रफ़ीक रात का सुरक्षा कर्मचारी था। हर सुबह उसे छत पर वही लाल कुर्सी मिलती थी। वह कुर्सी नीचे बाकी कुर्सियों के साथ रखता, मगर अगली सुबह वह फिर छत पर होती। उस शाम मालिक जगदीश ने कुर्सी देखकर कहा, “यह काम आज बंद होना चाहिए।” रफ़ीक ने कहा, “मैं रात भर यहाँ रहता हूँ, फिर भी कोई दिखाई नहीं देता।” “बारिश आई, तो इसका रंग खराब हो जाएगा,” जगदीश बोला। “कल भी यह ऊपर मिली, तो इसका पैसा तुम दोगे।” रफ़ीक ने कुर्सी नीचे रखी और हर रास्ता ध्यान से देखा। तभी खाना बनाने वाली सलमा दो कप चाय लेकर आई। उसने अपने कप में दो बार चीनी डाली। सलमा ने पूछा, “रफ़ीक भाई, आपके ऑफिस में नंबर वाले सवालों की कोई पुरानी किताब है?” “मेरी बेटी की एक किताब रखी है,” रफ़ीक ने कहा। “लेकिन तुम्हें क्यों चाहिए?” “अगले महीने परीक्षा है,” सलमा बोली। “काम के बाद थोड़ा पढ़ना चाहती हूँ।” रात करीब बारह बजे शादी भवन खाली हो गया। रफ़ीक ने सभी बिजली बंद की और लाल कुर्सी देखने गया। कुर्सी अपनी जगह पर नहीं थी। “इतनी जल्दी कौन ले गया?” उसने धीरे से कहा। वह छत पर पहुँचा, मगर वहाँ कोई नहीं था। लाल कुर्सी के एक पैर के नीचे किताब का छोटा भाग रखा था। उस पर प्रश्न अठारह लिखा था, और सीट पर थोड़ी चीनी पड़ी थी। रफ़ीक ने कुर्सी वहीं छोड़ी और नीचे जाने वाले रास्ते के पास चुप बैठ गया। करीब दो बजे हल्की आवाज आई। कोई किताब और चाय का कप लेकर छत पर आया। “सलमा,” रफ़ीक ने कहा, “आज प्रश्न मैं पूछूँगा।” सलमा रुक गई और उसने कप दोनों हाथों से पकड़ लिया। “आप मालिक को बताएँगे?” उसने पूछा। “पहले बताओ, यही कुर्सी क्यों?” सलमा ने उसके छोटे पैर की तरफ देखा। “इस कुर्सी को कोई शादी में नहीं रखता। मैं नीचे किताब का भाग रख देती हूँ, तो यह ठीक रहती है।” “और हर सुबह इसे यहीं क्यों छोड़ती हो?” “सुबह काम की आवाज आते ही नीचे जाना पड़ता है,” सलमा ने कहा। “घर में पढ़ने की जगह नहीं है, और यहाँ रात को शांति रहती है।” रफ़ीक ने प्रश्न अठारह वाला भाग उठाया। “चीनी और यह प्रश्न देखकर मुझे तुम पर शक हुआ था।” “अब मेरा काम जाएगा?” सलमा ने पूछा। रफ़ीक नीचे गया और कुछ देर बाद दूसरी कुर्सी लेकर लौटा। वह उसके पास बैठा और बोला, “किताब खोलो, आज प्रश्न अठारह हम दोनों करेंगे।”